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बगलामुखी कवच !! Baglamukhi Kavach

बगलामुखी कवच [ Baglamukhi Kavach ] : 

Baglamukhi Kavach का पाठ प्रत्येक साधक को हर रोज जरुर ही करना चाहिए ! यदि साधक बगलामुखी कवच का पाठ सुबह, दोपहर व् शाम तीनों समय करता है तो यह बहुत ही अच्छा परिणाम देता है ! Baglamukhi Kavach का पाठ करने से माँ बगलामुखी आपकी आपके शत्रु से रक्षा करती है ! बगलामुखी कवच करने से माँ बगलामुखी आपके हर कष्ट व दुखों को दूर करती है ! Jyotish Acharya Pandit Lalit Sharma के बताये गये बगलामुखी कवच को आप भी पढ़ कर अपने जीवन के सारे कष्ट व् दुखों को दूर कर सकोगे !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! जय श्री मेरे पूज्यनीय माता – पिता जी !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें : 7821878500

बगलामुखी कवच-पाठ | Baglamukhi Kavach-Path

शिरो मेंपातु ॐ ह्रीं ऐं श्रीं क्लीं पातुललाटकम । सम्बोधनपदं पातु नेत्रे श्रीबगलानने ।। १

श्रुतौ मम रिपुं पातु नासिकां नाशयद्वयम् । पातु गण्डौ सदा मामैश्वर्याण्यन्तं तु मस्तकम् ।। २ 

देहिद्वन्द्वं सदा जिह्वां पातु शीघ्रं वचो मम । कण्ठदेशं मनः पातु वाञ्छितं बाहुमूलकम् ।। ३ 

कार्यं साधयद्वन्द्वं तु करौ पातु सदा मम । मायायुक्ता तथा स्वाहा, हृदयं पातु सर्वदा ।। ४ 

अष्टाधिक चत्वारिंशदण्डाढया बगलामुखी । रक्षां करोतु सर्वत्र गृहेरण्ये सदा मम ।। ५ 

ब्रह्मास्त्राख्यो मनुः पातु सर्वांगे सर्वसन्धिषु । मन्त्रराजः सदा रक्षां करोतु मम सर्वदा ।। ६ 

ॐ ह्रीं पातु नाभिदेशं कटिं मे बगलावतु । मुखिवर्णद्वयं पातु लिंग मे मुष्क-युग्मकम् ।। ७ 

जानुनी सर्वदुष्टानां पातु मे वर्णपञ्चकम् । वाचं मुखं तथा पादं षड्वर्णाः परमेश्वरी ।। ८ 

जंघायुग्मे सदा पातु बगला रिपुमोहिनी । स्तम्भयेति पदं पृष्ठं पातु वर्णत्रयं मम ।। ९

जिह्वावर्णद्वयं पातु गुल्फौ मे कीलयेति च । पादोर्ध्व सर्वदा पातु बुद्धिं पादतले मम ।। १० 

विनाशयपदं पातु पादांगुल्योर्नखानि मे । ह्रीं बीजं सर्वदा पातु बुद्धिन्द्रियवचांसि मे ।। ११

सर्वांगं प्रणवः पातु स्वाहा रोमाणि मेवतु । ब्राह्मी पूर्वदले पातु चाग्नेय्यां विष्णुवल्लभा ।। १२

माहेशी दक्षिणे पातु चामुण्डा राक्षसेवतु । कौमारी पश्चिमे पातु वायव्ये चापराजिता ।। १३

वाराही चोत्तरे पातु नारसिंही शिवेवतु । ऊर्ध्वं पातु महालक्ष्मीः पाताले शारदावतु ।। १४

इत्यष्टौ शक्तयः पान्तु सायुधाश्च सवाहनाः । राजद्वारे महादुर्गे पातु मां गणनायकः ।। १५

श्मशाने जलमध्ये च भैरवश्च सदाऽवतु । द्विभुजा रक्तवसनाः सर्वाभरणभूषिताः ।। १६

योगिन्यः सर्वदा पान्तु महारण्ये सदा मम । इति ते कथितं देवि कवचं परमाद्भुतम् ।। १७

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Updated: May 3, 2017 — 12:39 pm

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