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काल भैरव अष्टमी कथा व् पूजा विधि !! Kaal Bhairav Ashtami Katha Or Pooja Vidhi

काल भैरव अष्टमी कथा व् पूजा विधि [ Kaal Bhairav Ashtami Katha Or Pooja Vidhi ] :

कालभैरव अष्टमी से जुड़ी कथा :

एक कथा के अनुसार एक बार सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने शिव जी के रूप-रेखा और वेश-भूषा पर कुछ अपशब्द बोल दिया, जिससे वह बहुत क्रोधित हुए तथा उनके शरीर से छाया के रूप में काल भैरव की उत्पत्ति हुई। मार्गशीर्ष माह की अष्टमी तिथि को ही काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी। क्रोध से उत्पन्न काल भैरव जी ने अपने नाखून से ब्रह्मा जी का सिर काट दिया। इसके बाद ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए काल भैरव तीनों लोकों में घूमें परन्तु कही भी उन्हें शांति नहीं मिली, अंत में घूमते हुए वह काशी पहुंचे जहां उन्हें शांति प्राप्त हुई। वहां एक भविष्यवाणी हुई जिसमें भैरव बाबा को काशी का कोतवाल बनाया गया तथा वहां रहकर लोगों को उनके पापों से मुक्ति दिलाने के लिए वहां बसने को कहा गया ! व् शिवपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को दोपहर में भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। इसलिए इस तिथि को काल भैरवाष्टमी या भैरवाष्टमी के नाम से जाना जाता है। पुराणों के अनुसार अंधकासुर दैत्य अपनी सीमाएं पार कर रहा था। यहां तक कि एक बार घमंड में चूर होकर वह भगवान शिव के ऊपर हमला करने का दुस्साहस कर बैठा। तब उसके संहार के लिए लिए शिव के खून से भैरव की उत्पत्ति हुई।

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भैरव जी की पूजा विधि :

भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं। शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। इनकी आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है। ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वाले भैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है। भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं। पौराणिक मान्यताओं में भैरव अवतार प्रदोष काल यानी दिन-रात के मिलन की घड़ी में हुआ। इसलिए भैरव पूजा शाम व रात के वक्त करें। रुद्राक्ष शिव स्वरूप है। इसलिए भैरव पूजा रुद्राक्ष की माला पहन या रुद्राक्ष माला से ही भैरव मंत्रों का जप करें। भैरव उपासना के लिए एक चौमुखा मिट्टी या पीतल का दीपक लें। इसमें सरसों के तेल का चौमुखा चिराग जलाएं। उपासक का मुंह पूजन करते समय पूरब में होना चाहिए। साथ ही उपासक को लाल रंग के आसान पर बैठना चाहिए। भैरव का आह्वान कर स्फटिक की माला से भैरव मंत्र का जप करें। जप पूरा होने के बाद भोग लगाए और भैरव की आरती तेल के दीप व कर्पूर से करें व् कालभैरव अष्टकम करके प्रसाद बांट दें ! 

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भैरव जी के प्रिय भोग :

भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बनी मिठाई इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगाना लाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है। इसके आलावा सरसों का तेल, काजल सिंदूर और चमेली का तेल आदि इनके श्रृंगार है।

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