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केमद्रुम योग का परिहार !! Kemadruma Yoga Ka Parihara

केमद्रुम योग का परिहार [ Kemadruma Yoga Ka Parihara ] :

केमद्रुम योग को महासत्यानाशी दोष भी माना जाता हैं ! यदि जन्मकुंडली में चन्द्रमा ग्रह के द्वितीय यानी आगे वाला भाव और द्वादश यानी पीछे वाला भाव में कोई ग्रह नही हो तो केमद्रुम योग ( Kemadruma Yoga ) नामक दोष का निर्माण होता हैं ! इसे इस प्रकार समझे चन्द्रमा कुंडली के जिस भी घर में हो, उसके आगे और पीछे के घर में कोई ग्रह न हो । इसके अलावा चन्द्रमा की किसी ग्रह से युति न हो या चंद्र को कोई शुभ ग्रह न देखता हो तो कुण्डली में केमद्रुम दोष बनता है । केमद्रुम दोष के संदर्भ में सूर्य ग्रह व् छाया ग्रह राहु केतु की गणना नहीं की जाती है । परन्तु यह केमद्रुम योग भंग होकर एक राजयोग का भी निर्माण करता हैं ! Online Specialist Astrologer Acharya Pandit Lalit Sharma द्वारा बताये जा रहे केमद्रुम योग भंग ( Kemadruma Yoga Bhanga ) को पढ़कर आप भी बहुत आसन तरीके से यह जान पाओगें की यह योग आपके लिए शुभ है या अशुभ प्रभाव देंगा !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! जय श्री मेरे पूज्यनीय माता – पिता जी !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें Mobile & Whats app Number : 7821878500 

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केमद्रुम योग का परिहार ( kemadruma yoga ka parihara  ) करने वाले प्रमुख योग निम्नलिखित हैं ।

  • चंद्रमा ग्रह पर बुध या गुरु ग्रह की पूर्ण रूप से दृष्टि हो अथवा लग्न में बुध या गुरु की स्थिति या दृष्टि हो ।
  • चंद्रमा ग्रह और गुरु ग्रह के मध्य भाव – परिवर्तन का संबंध बन रहा हो ।
  • चंद्रमा ग्रह व् अधिष्ठित राशि का स्वामी चंद्रमा ग्रह पर दृष्टि डाल रहा हो ।
  • चंद्रमा ग्रह व् अधिष्ठित राशि का स्वामी लग्न में स्थित हो । 

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  • चंद्रमा व् अधिष्ठित राशि का स्वामी गुरु ग्रह से दृष्ट हो ।
  • चंद्रमा ग्रह व् अधिष्ठित राशि का स्वामी चंद्रमा ग्रह से भाव परिवर्तन का संबंध बना रहा हो ।
  • चंद्रमा ग्रह व् अधिष्ठित राशि का स्वामी लग्नेश, पंचमेश, सप्तमेश या नवमेश के साथ युति या दृष्टि संबंध बना रहा हो ।
  • लग्नेश, पंचमेश, सप्तमेश और नवमेश में से कम से कम किन्ही दो भावेशों का आपस में युति या दृष्टि संबंध बन रहा हो ।
  • लग्नेश बुध या गुरु से दृष्ट होकर शुभ स्थिति में हो ।
  • चंद्रमा ग्रह केंद्र में स्वराशिस्थ या उच्च राशिस्थ होकर शुभ स्थिति में हो ।

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