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शमी वृक्ष की पूजा विधि !! Shami Vriksh Ki Puja Vidhi

शमी वृक्ष की पूजा विधि [ Shami Vriksh Ki Puja Vidhi ] :

स्कंद पुराण के अनुसार यदि जब दशमी नवमी से संयुक्त हो तो अपराजिता देवी का पूजन दशमी को उत्तर पूर्व दिशा में अपराह्न के समय में विजय और कल्याण की कामना से करना चाहिए ! हिन्दू धर्म के अनुसार अपराजिता पूजन के लिए दोपहर के समय उत्तर-पूर्व व् ईशान कोण की तरफ एक साफ शुद्ध भूमि और स्वच्छ स्थल पर गोबर से लीपना चाहिए ! उसके बाद फिर चंदन से आठ कोण ( चंदन, कुमकुम, पुष्प से अष्टदल कमल ) दल बनाकर संकल्प इस प्रकार से करना चाहिए – “मम सकुटुम्बस्य क्षेमसिद्धयर्थ अपराजिता पूजन करिष्ये”

अब इसके पश्चात उस आकृति के बीच में अपराजिता देवी का आवाहन करना चाहिए और इसके दाहिने एवं बायें जया एवं विजया का आवाहन करना चाहिए एवं साथ ही क्रिया शक्ति को नमस्कार एवं उमा को नमस्कार करना चाहिए। इसके पश्चात “अपराजितायै नमः” “जयायै नमः” “विजयायै नमः” मंत्रों के साथ षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। इसके बाद यह प्रार्थना करनी चाहिए की – ” हे देवी, यथाशक्ति मैंने श्रदा और आस्था के साथ आपकी जो पूजा की है वो अपनी रक्षा के लिए की है उसे स्वीकार कर आप अपने स्थान को जा सकती हैं। इस प्रकार अपराजिता देवी पूजन करने के बाद उत्तर-पूर्व की ओर शमी वृक्ष की तरफ जाकर पूजन करना चाहिए ।

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शमी का अर्थ शत्रुओं का नाश करने वाला होता है। शमी पूजन करते समय निम्न मंत्र का पाठ करें – “शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका। बाण रामस्य प्रियवादिनी।। करिष्यमाणयात्रायां यथाकाल सुखं मया। तत्र निर्विघ्नकत्र्रीत्वंभव श्रीरामपूजिते।।” मंत्र अर्थ- शमी पापों का शमन करती है। शमी के कांटे तांबे के रंग के होते हैं। यह अर्जुन के बाणों को धारण करती है। हे शमी, राम ने तुम्हारी पूजा की है। मैं यथाकाल विजययात्रा पर निकलंगा। तुम मेरी इस यात्रा को निर्विघ्नकारक व सुखकारक करो। ऐसा करने के बाद शमी वृक्ष के नीचे चावल, सुपारी व तांबे का सिक्का रखें और फिर वृक्ष की प्रदक्षिणा कर उसकी जड़ के पास मिट्टी व कुछ पत्ते घर लेकर आये। फिर थोड़ी सी मिट्टी वृक्ष के पास से लेकर उसे किसी पवित्र स्थान पर रख दें !

ध्यान रखे की शमी के कटे फटे हुए पत्ते और डालियों नही होनी चाहिए क्युकी इसे डालियाँ और पत्ते का पूजन निधेष होता है !  भगवान श्री राम के पूर्वज रघु ने विश्वजीत यज्ञ कर अपनी सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति दान कर दी तथा पर्ण कुटिया में रहने लगे। इसी समय कौत्स को चोदह करोड़ स्वर्ण मुद्राओं की आवश्कता गुरु दक्षिणा के लिए पड़ी। तब रघु ने कुबेर पर आक्रमण कर दिया तब कुबेर ने शमी एवं अश्मंतक पर स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा की थी तब से शमी व अश्मंतक की पूजा की जाती है। अश्मंतक के पत्र घर लाकर स्वर्ण मानकर लोगों में बांटने का रिवाज प्रचलित हुआ। अश्मंतक की पूजा के समय निम्न मंत्र बोलना चाहिए: अश्मंतक महावृक्ष महादोष निवारणम। इष्टानां दर्शनं देहि कुरु शत्रुविनाशम।। अर्थात हे अश्मंतक महावृक्ष तुम महादोषों का निवारण करने वाले हो, मुझे मेरे मित्रों का दर्शन कराकर शत्रु का नाश करो ।

शमी वृक्ष के उपाय [ Shami Vriksh Ke Upay ] :

भगवान श्री गणेश की को शमी दूर्वा की तरह पसन्द लगती हैं ! यह ‘वह्निवृक्ष या पत्र’ नाम से भी जाना जाता है। इसमें शिव का वास भी माना गया है, जो श्री गणेश के पिता हैं और मानसिक क्लेशों से मुक्ति देने वाले देवता हैं । नीचे बताई जा रही पूजा विधि से श्री गणेश जी की पूजा शमी से करने से जातक के पारिवारिक समस्या समाप्त हो जाती हैं व् मानसिक परेशानी दूर हो जाती हैं !

सुबह जल्दी जग कर नित्य कर्म निवृत होकर स्नान करके साफ़ कपडे पहनकर भगवान श्री गणेश जी का ध्यान व् पूजा करें । पूजन में श्री गणेश जी को गंध, अक्षत, फूल, सिंदूर अर्पित करें ! और नीचे लिखे मंत्र का उच्चारण करते हुए शमी पत्र अर्पित करें :

त्वत्प्रियाणि सुपुष्पाणि कोमलानि शुभानि वै । शमी दलानि हेरम्ब गृहाण गणनायक ।।

उसके बाद नैवेद्य अर्पित कर आरती करें !

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विजयादशमी की संध्या में शमी वृक्ष के नीचे दीपक जलाने से शत्रु पक्ष से युद्ध और मुक़दमो में विजय मिलती है और शत्रुओं का भय समाप्त होने के साथ आरोग्य व धन की प्राप्ति होती है ।

विजयादशमी के दिन शमी का पुँजन करने से घर में सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है क्युकी शमी का वृक्ष टोने-टोटके के दुष्प्रभाव और नकारात्मक प्रभाव को दूर करता है ! यदि विजयादशमी की संध्या में शमी वृक्ष के नीचे दीपक जलाने से शत्रु पक्ष से युद्ध और मुक़दमो में विजय मिलती है और शत्रुओं का भय समाप्त होने के साथ आरोग्य व धन की प्राप्ति होती है ।

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