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श्री सत्यनारायण व्रत कथा !! Shri Satyanarayan Vrat Katha

श्री सत्यनारायण व्रत कथा [ Shri Satyanarayan Vrat Katha ] : 

!! प्रथम अध्याय !!

एक समय नैमिशारन्य अठ्ठासी हजार ऋषियों ने श्री सूतजी से पूछा – हे प्रभु ; इस कलयुग में वेद विद्या रहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिलेगी तथा उनका उद्धार कैसे होगा ? इसलिए हे मुनिश्रेष्ठ ; कोई ऐसा व्रत कहिये जिससे थोड़े समय में पुण्य प्राप्त होवे तथा मनवांछित फल मिले , ऐसी कथा सुनने की हमारी इक्षा है . सर्वशास्त्र ज्ञाता सूतजी बोले – हे वैष्णवों में पूज्य ; आप सबने सर्व प्राणियों के हित की बात पूछी है . अब मै उस श्रेष्ठ व्रत को आप लोगो से कहूँगा , जिस व्रत को नारद जी ने लक्ष्मी नारायण से पूछा था . एक समय योगीराज नारदजी दूसरो के हित की इक्षा से अनेक लोको में घुमते हुए मृत्युलोक में आ पहुंचे वहां बहुत योनियों में जन्मे हुए प्रायः सभी मनुष्यों को अपने कर्मो के द्वारा अनेक दुखो से पीड़ित देखकर सोचा कि किस यत्न के करने से निश्चय ही इनके दुखो का नाश हो सकेगा . नारद ऐसा मन में सोचकर विष्णुलोक को गए . वहां श्वेत वर्ण और चार भुजाओ वाले देवो के ईश नारायण को , जिनके हाथो में शंख ,चक्र ,गदा और पदम् थे तथा वरमाला पहने हुए थे , देखकर स्तुति करने लगे . हे भगवान ! आप अत्यंत शक्ति से सम्पन्न है मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती ; आपका आदि मध्य और अंत नहीं है . निर्गुण स्वरूप सृष्टि के कारण भूत व् भक्तो के दुखो को नष्ट करने वाले हो . आपको मेरा नमस्कार है . नारदजी से इस प्रकार की स्तुति सुनकर विष्णु भगवान बोले की हे मुनिश्रेष्ठ ; आपके मन में क्या है ? आपका यहाँ किस काम के लिए आगमन हुआ है , निः संकोच कहो . तब नारद मुनि बोले – मृत्युलोक में सब मनुष्य जो अनेक योनियों में पैदा हुए है , अपने कर्मो के द्वारा अनेक प्रकार के दुखो से दुखित हो रहे है . हे नाथ मुझ पर दया रखते हो तो बतलाइए कि उन मनुष्यों के सब दुःख थोड़े से प्रयत्न से ही कैसे दूर हो सकते है ? श्री भगवान जी बोले – हे नारद ; मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है . जिस व्रत के करने से मनुष्य मोह से छुट जाता है ,मै वह कहता हूँ ,सुनो बहुत पुण्य देने वाला , स्वर्ग तथा मनुष्य लोक दोनों में दुर्लभ एक उत्तम व्रत है . आज मै प्रेमवश होकर तुमसे कहता हूँ . सत्यनाराण का यह व्रत अच्छी तरह विधान पूर्वक करके मनुष्य तुरन्त ही यहाँ सुख भोगकर मरने पर मोक्ष को प्राप्त होता है . श्री भगवान के वचन सुनकर नारद मुनि बोले – उस व्रत का क्या फल है ? क्या विधान है? किसने यह व्रत किया है और किस दिन यह व्रत करना चाहिए . विस्तार से बताइए . भगवान बोले – दुःख , शोक आदि को दूर करने वाला , धन धान्य को बढाने वाला , सौभाग्य तथा सन्तान को देने वाला यह व्रत सब स्थानों पर विजयी करने वाला है . भक्ति और श्रद्धा के साथ किसी भी दिन मनुष्य श्री सत्यनारायण भगवान की शाम के समय ब्राह्मणों और बंधुओ – बांधवों के साथ धर्मपरायण होकर पूजा करे . भक्ति भाव से नैवेद्य , केले का खम्ब , घी , दूध और गेंहू का चूर्ण सवाया लेवे . गेंहू के अभाव में साठी का चूर्ण , शक्कर तथा गुढ़ ले और सब भक्षण योग्य पदार्थ जमा करके भगवान को अर्पण कर देवे तथा बंधुओ सहित ब्राह्मणों को भोजन करावे तत्पश्चात स्वयं भोजन करे , नृत्य – गीत आदि का आचरण कर सत्यनारायण भगवान को स्मरण करते हुए समय व्यतीत करे . इस तरह व्रत करने पर मनुष्यों की इक्षा निश्चय ही पूरी होती है . विशेषकर कलि -काल में भूमि पर यही मोक्ष का सरल उपाय है . ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा प्रथम अध्याय सम्पूर्ण ॥

!! द्वितीय अध्याय !!

सूतजी बोले – हे ऋषियों ; जिन्होंने पहले समय में इस व्रत को किया है उनका वृतान्त कहता हूँ , ध्यान से सुनो . सुंदर काशीपुरी नगरी में अति निर्धन ब्राह्मण रहता था . वह भूख और प्यास से बेचैन हुआ नित्य ही पृथ्वी पर घूमता था . ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले भगवान ने ब्राह्मण को दुखी देखकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धर कर उसके पास जा आदर के साथ पूछा – हे विप्र ; नित्य दुखी हुआ पृथ्वी पर क्यों घूमता है ? हे श्रेष्ठ ब्राह्मण ; यह सब मुझसे कहो . मै सुनना चाहता हूँ . ब्राह्मण बोला – मै बहुत निर्धन ब्राह्मण हूँ , भिक्षा के लिए पृथ्वी पर फिरता हूँ . हे भगवन ; यदि आप इसका उपाय जानते हो तो कृपा कर कहो . वृद्ध ब्राह्मण बोला कि सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल को देने वाले है . इसलिए हे ब्राह्मण! तु उनका पूजन कर ,जिसके करने से मनुष्य सब दुखो से मुक्त होता है . ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बतलाकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करने वाले सत्यनारायण भगवान अन्तर्धान हो गये . जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण ने बतलाया है , मै उसको अवश्य करूंगा . यह निश्चय करने पर उस ब्राह्मण को भी नींद नहीं आई . वह सबेरे ही उठ , सत्यनारायण के व्रत का निश्चय कर भिक्षा के लिए चला .उस दिन उसको भिक्षा में बहुत सा धन मिला जिससे बन्धु बांधवों के साथ उसने सत्यनारायण का व्रत किया . उसके करने से वह ब्राह्मण सब दुखो से छुटकर अनेक प्रकार की सम्पत्तियों से युक्त हुआ . उस समय से वह ब्राह्मण हर मास व्रत करने लगा . इस तरह सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो करेगा , सब पापो से छुटकर मोक्ष को प्राप्त होगा .आगे जो पृथ्वी पर सत्यनारायण का व्रत करेगा वह मनुष्य सब दुखो से छुट जायेगा . इस तरह नारदजी ने सत्यनारायण का कहा हुआ यह व्रत तुमसे कहा . हे विप्र ; अब मै और क्या कहू . ऋषि बोले – हे मुनीश्वर ; संसार में इस ब्राह्मण से सुनकर किस -किस ने इस व्रत को किया , हम सब वह सुनना चाहते है . इसके लिए हमारे मन में श्रद्धा है . सूतजी बोले – हे मुनियों ; जिस जिसने इस व्रत को किया है वह सब सुनो . एक समय वह ब्राह्मण धन और ऐश्वर्य के अनुसार बन्धु – बान्धवों के साथ व्रत करने को तैयार हुआ , उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला बुढा आदमी आया और बाहर लकड़ियों को रखकर ब्राह्मण के मकान में गया . प्यास से दुखी लकड़हारा उनको व्रत करते देखकर ब्राह्मण को नमस्कार करके पूछने लगा कि आप यह क्या कर रहे है और इसके करने से क्या फल मिलता है ? कृपा करके मुझसे कहो . ब्राह्मण ने कहा – सब मनोकामनाओ को पूरा करने वाला यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है . इसकी ही कृपा से मेरे यहाँ धन धान्य आदि की वृद्धि हुई है . ब्राह्मण से व्रत के बारे में जानकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ चरणा मृत ले और प्रसाद खाने के बाद अपने घर को आया . लकड़हारे ने मन में इस प्रकार का संकल्प किया कि आज ग्राम में लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा . उसी से सत्यनारायण देव का उत्तम व्रत करूंगा . यह मन में विचार कर वह बुढा लकडहारा लकड़िया अपने सिर पर रखकर जिस नगर में धनवान लोग रहते थे. वह ऐसे सुंदर नगर में गया .उस दिन वहां पर बूढ़े को उन लकड़ियों का दाम पहले दिनों से चौगुना मिला . तब वह बुढा लकड़हारा दाम ले और अति प्रसन्न होकर पक्के केले की फली , शक्कर , घी , दूध , दही और गेंहू का चूर्ण इत्यादि सत्यनारायण भगवान के व्रत की कुल सामग्रियों को लेकर अपने घर गया . फिर उसने अपने भाइयो को बुलाकर विधि के साथ भगवान् का पूजन और व्रत किया . उस व्रत के प्रभाव से बुढा लकड़हारा धन , धान्य आदि से युक्त हुआ और संसार के समस्त सुख भोगकर बैकुंठ को चला गया . ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा द्वितीय अध्याय सम्पूर्ण ॥

!! तृतीय अध्याय !!

श्री सूतजी बोले- हे श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं आगे की एक कथा कहता हूँ। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक महान ज्ञानी राजा था। वह जितेन्द्रिय और सत्यवक्ता था। प्रतिदिन मन्दिरों में जाता तथा गरीबों को धन देकर उनके दुःख दूर करता था। उसकी पत्‍नी कमल के समान सुन्दर मुख वाली और सती साध्वी थी। एक दिन भद्रशीला नदी के तट पर वे दोनों विधि विधान सहित श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहे थे। उस समय वहाँ साधु नामक एक वैश्य आया। उसके पास व्यापार के लिए बहुत-सा धन था। वह वैश्य नाव को नदी किनारे पर ठहराकर राजा के पास आया। राजा को व्रत करते हुए देखकर उसने विनम्रतापूर्वक पूछा- हे राजन! यह आप क्या कर रहे हैं? मेरी सुनने की इच्छा है। कृपया आप यह मुझे भी समझाइये। महाराज उल्कामुख ने कहा- हे साधु वैश्य! मैं अपने बन्धु-बान्धवों के साथ पुत्र की प्राप्ति के लिए श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत व पूजन कर रहा हूँ। राजा के वचन सुनकर साधु नामक वैश्य ने आदर से कहा- हे राजन! मुझे भी इसका सम्पूर्ण विधि विधान बताएं। मैं भी आपके कहे अनुसार इस व्रत को करूँगा। मेरी भी कोई सन्तान नहीं है। मुझे विश्वास है, इस उत्तम व्रत को करने से अवश्य ही मुझे भी सन्तान होगी। राजा से व्रत के सब विधान सुन, व्यापार से निवृत्त हो, वह वैश्य सुखपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी पत्‍नी को सन्तान देने वाले उस व्रत के विषय में सुनाया और प्रण किया कि जब मेरे सन्तान होगी, तब मैं इस व्रत को करूँगा। वैश्य ने यह वचन अपनी पत्‍नी लीलावती से भी कहे। एक दिन उसकी पत्‍नी लीलावती श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से गर्भवती हो गई। दसवें महीने में उसने एक अति सुन्दर कन्या को जन्म दिया। दिनों-दिन वह कन्या इस तरह बढ़्ने लगी, जैसे शुक्लपक्ष का चन्द्रमा बढ़ता है। कन्या का नाम उन्होंने कलावती रखा। तब लीलावती ने मीठे शब्दों में अपने पति को याद दिलाया कि आपने जो भगवान का व्रत करने का सङ्कल्प किया था, अब आप उसे पूरा कीजिये। साधु वैश्य ने कहा- हे प्रिय! मैं कलावती के विवाह पर इस व्रत को करूँगा। इस प्रकार अपनी पत्‍नी को आश्वासन दे वह व्यापार करने विदेश चला गया। कलावती पितृगृह में वृद्धि को प्राप्त हो गई। लौटने पर साधु ने जब नगर में सखियों के साथ अपनी वयस्क होती पुत्री को खेलते देखा तो उसे उसके विवाह की चिन्ता हुई, तब उसने एक दूत को बुलाकर कहा कि उसकी पुत्री के लिए कोई सुयोग्य वर देखकर लाए। दूत साधु नामक वैश्य की आज्ञा पाकर कन्चननगर पहुँचा और देख-भालकर वैश्य की कन्या के लिए एक सुयोग्य वणिक पुत्र ले आया। उस सुयोग्य लड़के के साथ साधू नमक वैश्य ने अपने बन्धु-बान्धवों सहित प्रसन्नचित्त होकर अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। दुर्भाग्य से वह विवाह के समय भी सत्यनारायण भगवान का व्रत करना भूल गया। इस पर श्री सत्यनारायण भगवान अत्यन्त क्रोधित हो गए। उन्होंने वैश्य को श्राप दिया कि तुम्हें दारुण दुःख प्राप्त होगा। और फिर अपने कार्य में कुशल वह वैश्य अपने दामाद सहित नावों का बेड़ा लेकर व्यापार करने के लिए सागर के समीप स्थित रत्‍नसारपुर नगर में गया। रत्‍नसारपुर पर चन्द्रकेतु नामक राजा राज करता था। दोनों ससुर-जमाई चन्द्रकेतु राजा के उस नगर में व्यापार करने लगे। एक दिन भगवान सत्यनारायण की माया से प्रेरित एक चोर राजा चन्द्रकेतु का धन चुराकर भाग रहा था। राजा के दूतों को अपने पीछे तेजी से आते देखकर चोर ने घबराकर राजा के धन को वैश्य की नाव में चुपचाप रख दिया, जहाँ वे ससुर-जमाई ठहरे हुए थे और भाग गया। जब दूतों ने उस वैश्य के पास राजा के धन को रखा देखा तो उन्होंने उन ससुर-दामाद को ही चोर समझा। वे उन ससुर-दामाद दोनों को बाँधकर ले गए और राजा के समीप जाकर बोले- आपका धन चुराने वाले ये दो चोर हम पकड़कर लाए हैं, देखकर आज्ञा दें। तब राजा ने बिना उस वैश्य की बात सुने उन्हे कारागार में डालने की आज्ञा दे दी। इस प्रकार राजा की आज्ञा से उनको कारावास में डाल दिया गया तथा उनका सारा धन भी छीन लिया गया। सत्यनारायण भगवान के श्राप के कारण उस वैश्य की पत्‍नी लीलावती व पुत्री कलावती भी घर पर बहुत दुःखी हुईं। उनका सारा धन चोर चुराकर ले गए। मानसिक व शारीरिक पीड़ा तथा भूख-प्यास से अति दुःखी हो भोजन की आस मे कलावती एक ब्राह्मण के घर गई। उसने ब्राह्मण को श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत विधिपूर्वक करते देखा। उसने कथा सुनी तथा श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण कर रात को घर आई। माता ने कलावती से पूछा- हे पुत्री! तू अब तक कहाँ रही, मैं तेरे लिए बहुत चिन्तित थी। माता के शब्द सुन कलावती बोली- हे माता! मैंने एक ब्राह्मण के घर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा है और मेरी भी उस उत्तम व्रत को करने की इच्छा है।माता ने कन्या के वचन सुनकर सत्यनारायण भगवान के पूजन की तैयारी की। उसने बन्धुओं सहित श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन व व्रत किया और वर माँगा कि मेरे पति और दामाद शीघ्र ही घर लौट आएँ। साथ ही विनती की कि हे प्रभु! अगर हमसे कोई भूल हुई हो तो हम सबका अपराध क्षमा करो। श्री सत्यनारायण भगवान इस व्रत से प्रसन्न हो गए। उन्होंने राजा चन्द्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा – हे राजन! जिन दोनों वैश्यों को तुमने बन्दी बना रखा है, वे निर्दोष हैं, उन्हें प्रातः ही छोड़ दो। उनका सब धन जो तुमने अधिग्रहित किया है, लौटा दो, अन्यथा मैं तुम्हारा राज्य, धन, पुत्रादि सब नष्ट कर दूँगा। राजा से ऐसे वचन कहकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गए। और फिर प्रातः काल राजा चन्द्रकेतु ने दरबार में सबको अपना स्वप्न सुनाया और सैनिकों को आज्ञा दी कि दोनों वैश्यों को कैद से मुक्त कर दरबार में ले आयें। दोनों ने आते ही राजा को प्रणाम किया। राजा ने कोमल वचनों में कहा- हे महानुभावों! तुम्हें अज्ञानतावश ऐसा कठिन दुःख प्राप्त हुआ है। अब तुम्हें कोई भय नहीं है, तुम मुक्त हो। इसके बाद राजा ने उनको नये-नये वस्त्राभूषण पहनवाए तथा उनका जितना धन लिया था, उससे दुगना लौटाकर आदर से विदा किया। दोनों वैश्य अपने घर को चल दिये। ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा तृतीय अध्याय सम्पूर्ण ॥

!! चतुर्थ अध्याय !!

सूतजी ने आगे कहा- वैश्य ने यात्रा आरम्भ की और अपने नगर को चला। उनके थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर दण्डी वेषधारी श्री सत्यनारायण भगवान ने उसकी परीक्षा लेने हेतु उससे पूछा- हे वैश्य! तेरी नाव में क्या है? अभिमानि वणिक हँसता हुआ बोला- हे दण्डी! आप क्यों पूछते हैं? क्या धन लेने की कामना है? मेरी नाव में तो बेल के पत्ते भरे हैं। वैश्य के ऐसे वचन सुनकर दण्डी वेशधारी श्री सत्यनारायण भगवान बोले- तुम्हारा वचन सत्य हो! ऐसा कहकर वे वहाँ से चले गए और कुछ दूर जाकर समुद्र के तट पर बैठ गए। दण्डी महाराज के जाने के पश्‍चात वैश्य ने नित्य-क्रिया से निवृत्त होने के बाद नाव को ऊँची उठी देखकर अचम्भा किया तथा नाव में बेल-पत्ते आदि देखकर मूर्च्छित हो जमीन पर गिर पड़ा। मूर्च्छा खुलने पर अति शोक करने लगा। तब उसके दामाद ने कहा- आप शोक न करें। यह दण्डी महाराज का श्राप है, अतः हमें उनकी शरण में ही चलना चाहिये, वही हमारे दुःखों का अन्त करेंगे। दामाद के वचन सुनकर वह वैश्य दण्डी भगवान के पास पहुँचा और अत्यन्त भक्तिभाव से पश्चाताप करते हुए बोला- मैंने जो आपसे असत्य वचन कहे थे, उनके लिए मुझे क्षमा करें। ऐसा कहकर वह शोकातुर हो रोने लगा। तब दण्डी भगवान बोले- हे वणिक पुत्र! मेरी आज्ञा से ही बार-बार तुझे दुख कष्ट प्राप्त हुआ है, तू मेरी पूजा से विमुख हुआ है। तब उस वैश्य ने कहा- हे भगवन! आपकी माया को ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जान पाते, तब मैं मुर्ख भला कैसे जान सकता हूँ। आप प्रसन्न होइये, मैं अपनी क्षमता अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मेरी रक्षा कीजिये और मेरी नौका को पहले के समान धन से परिपूर्ण कर दीजिये। उसके भक्ति से परिपूर्ण वचन सुनकर श्री सत्यनारायण भगवान प्रसन्न हो गए और उसकी इच्छानुसार वर देकर अन्तर्ध्यान हो गए। तब ससुर व दामाद दोनों ने नाव पर आकर देखा कि नाव धन से परिपूर्ण है। फिर वह विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन कर साथियों सहित अपने नगर को चला। जब वह अपने नगर के निकट पहुँचा तब उसने एक दूत को अपने घर भेजा। दूत ने साधु नामक वैश्य के घर जाकर उसकी पत्‍नी को नमस्कार किया और कहा- आपके पति अपने जमाता सहित इस नगर मे समीप आ गए हैं। लीलावती और उसकी कन्या कलावती उस समय भगवान का पूजन कर रही थीं। दूत का वचन सुनकर साधु की पत्‍नी ने बड़े हर्ष के साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन पूर्ण किया और अपनी पुत्री से कहा- मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूँ, तू पूजन पूर्ण कर शीघ्र आ जाना। परन्तु कलावती पूजन एवम् प्रसाद छोड़कर अपने पति के दर्शन के लिए चली गई। पूजन एवम् प्रसाद की अवज्ञा के कारण भगवान सत्यनारायण ने रुष्ट हो, उसके पति को नाव सहित पानी में डुबो दिया। कलावती अपने पति को न पाकर रोती हुई जमीन पर गिर पड़ी। नौका को डूबा हुआ तथा कन्या को रोती हुई देख साधु नामक वैश्य द्रवित हो बोला- हे प्रभु! मुझसे या मेरे परिवार से अज्ञानतावश जो अपराध हुआ है, उसे क्षमा करें। उसके ऐसे वचन सुनकर सत्यदेव भगवान प्रसन्न हो गए। आकाशवाणी हुई- हे वैश्य! तेरी पुत्री मेरा प्रसाद छोड़कर आई है, इसलिए इसका पति अदृश्य हुआ है। यदि वह घर जाकर प्रसाद ग्रहण कर लौटे तो इसे इसका पति अवश्य मिलेगा। आकाशवाणी सुनकर कलावती ने घर पहुँचकर प्रसाद ग्रहण किया और फिर आकर अपने पति को पूर्व रूप में पाकर वह अति प्रसन्न हुई तथा उसने अपने पति के दर्शन किये। तत्पश्‍चात साधु वैश्य ने वहीं बन्धु-बान्धवों सहित सत्यदेव का विधिपूर्वक पूजन किया। वह इस लोक के सभी प्रकार के सुख भोगकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त हुआ। ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा चतुर्थ अध्याय सम्पूर्ण ॥

!! पञ्चम अध्याय !!

श्री सूतजी बोले– हे ऋषिगण! मैं एक और कथा कहता हूँ, आप सभी ध्यान से सुनो- सदा प्रजा के लिए चिन्तित तुङ्गध्वज नाम का एक राजा था। उसने भगवान सत्यनारायण का प्रसाद त्यागकर बहुत कष्ट पाया। एक समय राजा वन में वन्य पशुओं को मारकर बड़ के वृक्ष के नीचे आया। वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति-भाव से बन्धु-बान्धवों सहित श्री सत्यनारायणजी का पूजन करते देखा। परन्तु राजा देखकर भी अभिमान के कारण न तो वहाँ गया और न ही सत्यदेव भगवान को नमस्कार ही किया। जब ग्वालों ने भगवान का प्रसाद उसके सामने रखा तो वह प्रसाद छोड़कर अपने नगर को चला गया। नगर में पहुँचकर उसने देखा कि उसका सारा राज्य नष्ट हो गया है। वह समझ गया कि यह सब भगवान सत्यदेव ने रुष्ट होकर किया है। तब वह वन में वापस आया और ग्वालों के समीप जाकर विधिपूर्वक पूजन कर प्रसाद ग्रहण किया तो सत्यनारायण की कृपा से सब-कुछ पहले जैसा ही हो गया और लम्बे समय तक सुख भोगकर मरणोपरान्त वह मोक्ष को प्राप्त हुआ। जो मनुष्य इस श्रेष्ठ दुर्लभ व्रत को करेगा, श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से उसे धन-धान्य की कोई कमी नहीं होगी। निर्धन धनी और बन्दी बन्धनों से मुक्त होकर निर्भय हो जाता है। सन्तानहीन को सन्तान प्राप्त होती है तथा सब इच्छाएँ पूर्ण कर अन्त में वह बैकुण्ठ धाम को जाता है। अब उनके बारे में भी जानिए, जिन्होंने पहले इस व्रत को किया, अब उनके दूसरे जन्म की कथा भी सुनिये। शतानन्द नामक वृद्ध ब्राह्मण ने सुदामा के रूप में जन्म लेकर श्रीकृष्ण की भक्ति एवम् सेवा कर बैकुण्ठ प्राप्त किया। उल्कामुख नामक महाराज, राजा दशरथ बने और श्री रङ्गनाथ का पूजन कर मोक्ष को प्राप्त हुए। साधु नाम के वैश्य ने धर्मात्मा व सत्यप्रतिज्ञ राजा मोरध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीरकर बैकुण्ठ धाम प्राप्त किया। महाराज तुङ्ग्ध्वज स्वयंभू मनु बने? उन्होंने बहुत से लोगों को भगवान की भक्ति में लीन कराकर बैकुण्ठ धाम प्राप्त किया। लकड़हारा अगले जन्म में गुह नामक निषाद राजा बना, जिसने राम के चरणों की सेवा कर अपने सभी जन्मों को सँवार लिया। ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा पञ्चम अध्याय सम्पूर्ण ॥

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