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सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् !! Siddha Kunjika Stotram

सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् [ Siddha Kunjika Stotram ] : 

आज हम आपको श्री दुर्गा माँ के एक चमत्कारी सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम्  ( Siddha Kunjika Stotram ) के बारे में बताने जा रहे है ! जो भी साधक इस सात सौ मन्त्रों की ‘श्री दुर्गा सप्तशती, का पाठ करता है उसका कल्याण हो जाता है ! क्युकी Siddha Kunjika Stotram एक कल्याणकारी पाठ है ! यह ‘गुप्त-सप्तशती’ प्रचुर मन्त्र-बीजों के होने से आत्म-कल्याण साधकों के लिए अमोघ फल-प्रद है । यह पाठ को कैसे करें इसका क्रम इस तरह से है ! प्रारम्भ में ‘कुञ्जिका-स्तोत्र’ का पाठ कीजिये फिर उसके बाद ‘गुप्त-सप्तशती’ का पाठ कीजिये तदन्तर ‘स्तवन‘ का पाठ कीजिये ! दिए गये क्रम से पाठ करने पर आपको सफ़लता मिलेगी ! 

॥ कुञ्जिका-स्तोत्रम् अथवा सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

ॐ अस्य श्रीकुञ्जिकास्तोत्रमन्त्रस्य सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीत्रिगुणात्मिका देवता, ॐ ऐं बीजं, ॐ ह्रीं शक्तिः, ॐ क्लीं कीलकम्, मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

शिव उवाच

श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्‌।

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्‌॥1॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्‌।

न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्‌॥2॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्‌।

अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्‌॥3॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌।

पाठमात्रेण संसिद्ध्‌येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्‌ ॥4॥

॥ अथ मंत्र ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा 

॥ इति मंत्रः॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि । नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषामर्दिनि ॥1॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि  ॥2॥ 

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे। ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका॥3॥

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते। चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी॥4॥

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणी ॥5॥

धां धीं धू धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। क्रां क्रीं क्रूं कालिका देविशां शीं शूं मे शुभं कुरु॥6॥

हुं हु हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥7॥

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥ 

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥8॥ 

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे॥ इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।

अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥ यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत्‌।

न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥ 

। इति श्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ।


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